Sunday, 5 April 2015

ॐ ओम बन्ना बुलेट वाले बाबा ओम सिंह राठौड़ भोमियाजी महाराज

ओम सिंह राठौड़ से ॐ बन्ना तक की पूरी कहानी !
परिचय
वेसे आज के दिन ॐ बन्ना जेसी शख्क्षियत किसी परिचय की मोहताज नहीं है फिर भी में आप से जिस शख्स के बारे में बताने जा रहा हु वह है "ओम बन्ना" और उन का वह स्थान जिसे आज पुरे राजस्थान ही नहीं पुरे भारत भर में ओम बन्ना, ॐ बन्ना, बुलेट मोटर साईकिल वाले राठौड बन्ना, चोटिला राजा और बुलेट वाले बाबा जेसे कई नामो से जाना जा रहा है और यह ही वह दुर्लभ देव स्थान है जहा ओम बन्ना के साथ साथ बुलेट मोटर साईकिल यानी वाहन से मन्नत मनौती मांगी जाती है !!! 

ओम बन्ना पाली शहर व उक्त देवस्थान के पास ही स्थित चोटिला गांव के मूल निवासी थे | वे ठाकुर जोग सिंह राठौड़ के पुत्र थे जिनका इसी स्थान से जोधपुर व अन्य जगह रोज आना जाना अपनी हर दिल अजीज़ प्रियतम बुलेट मोटर साईकिल से होता रहता था | ॐ बन्ना कही पर भी अपनी बुलेट मोटर साईकिल के अलावा किसी दुसरे वाहन से आते जाते नहीं थे | 

जहां आज "ओम बन्ना" का वह मूल देव स्थान है वहा स्वयं ओम बन्ना  (ओम सिंह राठौड़) ने ही अपनी बुलेट मोटर साईकिल पर जाते हुए 1988 में अष्टमी के दिन एक भयंकर सड़क दुर्घटना में अपनी देह त्याग दी थी |
 
ओम बन्ना का यह स्थान जोधपुर से चलकर अहमदाबाद की और के राष्ट्रिय राजमार्ग संख्या 65 पर जोधपुर शहर से लगभग 45 किमी की दुरी पर मुख्य सड़क पर ही स्थित है यहाँ से पाली जिला मुख्यालय लगभग 20 किमी रह जाता है  | 
राष्ट्रिय राजमार्ग के इस स्थान पर सड़क के किनारे में चढ़ावे व पूजा अर्चना के सामान से सजी धजी दुकाने दिखाई पड़ती है व वही नजर आता है जातरुओ की श्रद्धा से घिरा एक देवस्थल जिसके ऊपर एक विशाल ओम सिंह राठौड़ (ओम बन्ना) की अश्वारुढ प्रतिमा व फोटो लगी है और साथ ही 
 नजर आती दिव्य
अखंड ज्योत जिसमे जातरुओ के चढ़ावे, घर से लाये पकवानों और नारियल आदि को चढ़ाकर भोग लगाया जाता है, साथ में लाई गई फूल मालाओ और पुष्पों को वहा अवस्थित बुलेट मोटर साईकिल नंबर आर अन जे- 7773 पर चढ़ाया जाता है और इसके साथ अपने व अपने प्रियजनों के किसी भी वाहन और दुसरे वाहनों से किसी भी प्रकार की दुर्घटनाओ के कभी न होने की मन्नत मांगी जाती है | 

क्यों मांगी जाती है बुलेट मोटर साईकिल RNJ- 7773 से मन्नत ???
 
स्थानीय रहवासियों व उनमे आस्था रखने वालो के अनुसार इस स्थान पर पहले हर रोज कोई न कोई वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाया करता था जिस पेड के पास ओम सिंह राठौड़ की दुर्घटना घटी थी उसी जगह पता नहीं कैसे कई वाहन दुर्घटना का शिकार पहले भी हो गए थे, जो हर समय रहस्य ही बना हुवा था | अब तक बहुत सारे लोग इसी जगह दुर्घटना के शिकार बन अपनी जान तक गँवा चुके थे | 
क्या क्या हुवा दुर्घटना के बाद और चमत्कार ??
ओम सिंह राठौड़ की दुर्घटना में मृत्यु के बाद पुलिस कार्यवाही के तहत उनकी इस बुलेट मोटर साईकिल को थाने में ले जाकर खड़ा कर दिया गया, लेकिन दुसरे दिन ही थाने से बुलेट मोटर साईकिल गायब देखकर पुलिस कर्मी हैरान रह गए, सब जगह तलाश करने पर बुलेट मोटर साईकिल फिर वही दुर्घटना स्थल पर ही उन्हें वापस मिलती है |

 पुलिस कर्मीयो द्वारा वापस बुलेट मोटर साईकिल थाने लाई गई लेकिन फिर वही घटना कई बार घटती है, बुलेट मोटर साईकिल थाने में नहीं मिलती है,अंतिम बार बुलेट मोटर साइकिल को लाने के बाद उसमें से पूरा पेट्रोल निकाल लेते और उसको जंजीर की सहायता से बाँध कर पुलिस की चौकसी में रख देते है 
फिर भी हर बार की तरह बुलेट मोटर साईकिल थाने से रात के समय गायब होकर दुर्घटना की जगह अपने आप पहुँच जाती है, सुबह देखने पर वही मिलती है |

 
आखिर करना पड़ा चमत्कार को नमस्कार
 
आखिरकार पुलिस कर्मियों व ओम सिंह राठौड़ के पिता ने ओम सिंह राठौड़ की आत्मा की यही इच्छा समझते हुए उस बुलेट मोटर साईकिल को वही उसी पेड के पास रख दिया गया जहां आज विराजमान है | 
इस तरह इसी चमत्कारीक बुलेट मोटर साईकिल ने स्थानीय रहवासी लोगों को ही नहीं बल्कि यहा के पुलिस थाने के पुलिसकर्मियों को भी चमत्कार दिखाकर आश्चर्यचकित कर दिया और इसी चमत्कार के कारण है आज भी यहा के थाने में कोई भी नया आने वाला पुलिस कर्मी अपनी ड्यूटी चढ़ने से पहले यहा मत्था टेककर आशीर्वाद जरुर लेता है |

उक्त घटना पश्चात रात्रि में कई वाहन चालको को ओम सिंह राठौड़ वाहनों को दुर्घटना से बचाने के उपाय करते व चालकों को रात्रि में दुर्घटना से सावधान करते अकस्मात प्रत्यक्ष ही दिखाई देने लगे | वे उस दुर्घटना संभावित जगह तक पहुँचने वाले वाहन को जबरदस्ती रोक देते है या धीरे कर देते है ताकि उनकी तरह कोई और वाहन चालक असामयिक मौत का शिकार न बने! कई होने वाली दुर्घटनाओ में घटित होने वाले ने यह भी बताया की उसको किसी विशेष व्यक्ति ने उस जगह से एकदम से साईड में कर दिया और उसके पश्चात वह दुर्घटना घटित हुई और उसके बाद से आज तक उस जगह दुबारा कोई भी मानव हानि होने वाली दूसरी दुर्घटना नहीं हुयी है | 

ओम सिंह राठौड़ के न रहने के बाद भी उनकी आत्मा द्वारा इस तरह का नेक कार्य करते देखे जाने पर वाहन चालको व स्थानीय लोगों में उनके प्रति मन में ओर भी श्रद्धा अगाध रूप से बढ़ती गयी और इसी श्रद्धा का नतीजा है कि ओम बना के इस स्थान पर हर वक्त उनकी पूजा अर्चना व मन्नत मनौती के लिए जातरुओ का आना जाना लगा रहता है उस राष्ट्रिय राजमार्ग से गुजरने वाला हर वाहन यहा पर थोड़ी देर रुक कर ओम बन्ना के यहा अपना मस्तक टिका कर, उन्हें नमन करके ही अपने गंतव्य की और आगे बढ़ता है | 
आज पुरे देश व प्रान्त भर से लोग ॐ बन्ना के स्थान पर आकर उनमे अपनी अप्रतिम श्रद्धा प्रकट कर उनसे व उनकी बुलेट मोटर साईकिल नंबर आर अन जे - 7773 से अपने अपनों के लिए मन्नत मनौती मांगते है | 

इसी कारण आज यहा ॐ बन्ना की पूजा अर्चना के साथ साथ उनकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है व उस बुलेट मोटर साईकिल से भी मन्नत मनौती मांगी जाती है |
यह थी श्री ॐ बन्ना के बारे में छोटी सी जानकारी जो मुझे ॐ बन्ना के स्थान पर दो बार जाने के पश्चात व उनके पिता श्री जोग सिंह राठौड, अन्य दुसरे ग्राम वासियों और श्री ओम सिंह राठौड के पुत्र श्री महापराक्रम सिंह राठौड से बातचीत कर यह सारी जानकारी मिली जो आपके द्रश्य पटल पर रखी है |
सादर आभार भंवर सिंह राठौड ठिकाना जूसरी

जय श्री ॐ बन्ना ||


Saturday, 4 April 2015

एक कङवी सच्चाई शादी व बारात की रात की !!

मै जो यह कह रहा हु वह बहुत जगह या यु कहू ज्यादातर बारात और शादीयो में देखने को मिलता ही रहता है, कुछ ही समय पूर्व मेरा भी एक परिचित की पुत्री के विवाह में जाने का अवसर मिला !! वहा बारात भी किन्ही ऊचें रईसो के यहां से आई हुई थी। बारात के स्वागत और मान मनुवार की व्यवस्था एक बड़ी जगह और गाँव के मध्य में ही की गई थी ।
वह जगह भी गाँव के बीचों बीच थी, शाम को जब मै उनके यहा पहुँचा तो देखा वहा उस विशाल चौक में हर प्रकार की खाने पिने की व्यवस्था की गई है, खूब सारी टेबल्स लगी हुई थी बीच में एक बड़ा मंच जेसा भी बना हुवा था। साज सज्जा और वहा की भव्यता देख कर मन प्रसन्नचित हुए बगैर नहीं रह सका।
अब शुरू होती है महफ़िल की तैयारी जो टेबलोँ पर शुरू होने जा रही थी। करीब 25 मिनट के अंतराल के पश्चात देखता हु तो साफे पहने सब लोग  ड्रिंक्स लेने और पिने पिलाने में मशगुल हो गए थे, कईयो के हाथ मे तलवारें भी थी तो कइयो के चेहरे दमक रहे थे, आपस में बाते कम ही कर रहे थे और हंसने मे मशगुल ज्यादा थे !!
मै भी सब से मिल कर बैठा ही था कि अचानक एक हिजड़े जैसा लगने वाला आदमी मंच पर आया। कुछ सस्ते से शेर सुनाने लगा और अनाउंस करने लगा कि मुम्बई से कोई मशहूर नर्तकिया आने वाली है। देखते ही देखते दो बेडौल सी पूरी तरह  लिपी पुती औरते मंच पर आई। और फिर उन्होंने फ़िल्मी गीतो पर कूल्हे मटका मटका कर नाचना शुरू कर दिया। बेटी के ब्याह में ऐसी व्य्वस्थाये देख कर हर कोई दंग रह  सकता है लेकिन इसमें  मुझे तो कोई अचंभा नहीं हुवा !!!
सभी बन्ना लोग शुरुआत में अकड़े से बैठे थे। कुछ सीधे तो कुछ तिरछी निग़ाहों से लटके झटके देख रहे थे। तेज म्यूजिक की आवाज से आसपास के घर वाले छतो पर चढ़ गए और तमाशा देखने लग गए थे। मुझे लगा कम से कम टेंट तो थोड़ा ऊँचा लगवाया होता तो ये पडोसी इस तरह टुकर टुकर नहीं देखते !! एक दो पैग घुट के अंदर जाने के बाद बन्ना लोग थोड़े नरम पड़े। अब उन सबके मुँह से आह और वाह निकलने लग गई थी !!!
कुछ रणबांकुरे मंच तक भी जा पहुंचे थी और नोट लहरा लहरा कर डांसर को अपनी और बुलाने लगे !!
एक बार उठ कर विदा लेने का विचार आया पर फिर सोचा क्यों न आज इन महान पैसो वाले परिवार के महान सांस्कृतिक कार्यक्रम का नजारा कुछ और देर तक लिया जाए !! डांसर बदलती रही, घटिया शायरी चलती रही, दारू की नदियाँ बहती रही, सामने बाप पीता रहा। टेंट की आड़ में बेटा और घर के भीतर अन्य लोग  !!

सभी लोग बखूबी तरह से ढोंगी परम्पराओ का पालन कर रहे थे !!! कुछ ही देर बाद अकड़ी हुई गर्दने लुढ़कने लगी !! कोट के बटन ढीले होने लगे। झूटी शान ओ शोकत के वही घिसे पिटे दरबारी दोहे सुने और सुनाये जाने लगे !! साफे (स्वाभिमान) पहले पहल सर पर दिख रहा था वो हाथ में आ गये थे, फिर टेंट की कुर्सीयो पर, कुछ को जगह नही मिली तो नीचे जमीन पर पहुंच गए  थे !!!
तलवारे भी वापस गाड़ियों में रखवा दी गयी, अगली शादी फंक्शन तक अब उनका कोई काम नही रह गया था शायद !!

अब बड़े बूढे उठ कर जाने लगे और कइयो को उठा कर ले जाया जाने लगा !! अब तक तो हमारी नई रॉयल पीढ़ी अपने पुरे रंग में आ गई थी !! फिर वासना और भोंडेपन की जो मर्यादाये लांधी गई का वर्णन मेरे द्वारा सम्भव नहीँ !! दारू के गिलास के साथ नोट पकड़ पकड़ कर पता नही कौनसी रीती नीती के तहत एक दूसरे को दारू की मनुहारों का अंतहीन सिलसिला भी चल पड़ा था !! फिर निछरावल का ड्रामा चला, वो उस पर लक्ष्मी बरसाता है तो वो बढ़ चढ कर दुसरे पर !!! कुछ लोग तो नोट को एक दूसरे की खोपड़ी पर इस प्रकार घुमा रहे है कि नोट पर बैठे गांधी को भी चक्कर आ गए होंगे शायद !! फोटो खिंचवाने के लिए बीच बीच में रुक भी जाते थे !! दारू पीकर एक दूसरे की खोपड़ी पर नोट घुमाने और डांसर के असिस्टेंट को देने कि क्रिया बहुत बढ़ सी गयी थी, नोट चुगने वालो से नोट बमुस्किल चुगे भी नहीं जा रहे थे ! मुझे ख्याल आया कि इनमे से एक दो को तो जरूर उधार लेकर घर जाना पड़ेगा क्यों की वो बेहिसाब डांसर पर नोटों की बरसात जो कर रहे थे !!!
एक बार तो लगा शायद इन सबके और पूरी जाती के ही अच्छे दिन आ गए है और कल सुबह से ही खोया हुवा राज काज वापस आने वाला या मिलने वाला है !! डी जे की तेज आवाज में ही मै गहरी श्वास ले वहाँ से निकल पड़ा !! पता नही क्यों जो लोग आसपास से देख रहे थे उनसे निगाह मिलाने की हिम्मत भी नही हो रही थी !! रास्ते में चलते चलते सोच रहा था मेरी जाती वाले बाते तो बड़ी बड़ी करती है !! सब अपने आप को वैदिक काल का क्षत्रिय बताने से नहीं चुकते  है !!!
विवाह जेसे वैदिक संस्कार पर घर के आँगन में वेश्याओ द्वारा नांच गान, उनके संग भांड की तरह नाचना, शराब और मांस का परोसा जाना !!! क्या है यह सब ???
दूल्हा दारू पीकर फेरों के लिए यज्ञ में बैठता है !! ये कैसी परम्पराये है जिन का निर्वहन ये सबसे सभ्य समाज आज कर रहा है और बेहयाई से निभाने की झूटी कोशिसो में लगा हुवा है ???

अपने आपको राम और कृष्ण के वँशज मानने वाले और जीवन जी रहे है कबाईलियों जैसा !!!
या यु कहू काहे के बन्ना, काहे के राजपूत, काहे के क्षत्रिय ???? सब झूट है, सब झूट है, सब झूट है !
उल्टियां करते लोग, धूल में पड़े उनके साफे, डिक्की में पड़ी उनकी तलवारें और अन्य शस्त्र शास्त्र !!!

मै आप सब से पूछना चाहुँगा की क्या यही दिन बाकी रह गये थे, जो हमारे पुरखे अपना सर्वस्व लुटा कर हम जेसो के लिए असमय ही काल कवलित हो गए थे ???

Friday, 3 April 2015

दारु शराब पीना और मांस खाना पाप या पुण्य कार्य !!

 मैं जब किसी को बताता हूँ कि मैं क्षत्रिय हूँ लेकिन मांस-मदिरा का उपयोग प्रयोग नहीं करता तो उन्हें बड़ा आश्चर्य होता है तथा उन्हें ये झूठ लगता है और कहते है की आज आप और आपका समाज क्या,  ऐसा कोई समाज नहीं बचा जो इस बीमारी से अछूता रहता हो ???

हमारे क्षत्रिय समाज के बारे में ये धारणा है की राजपूत है तो मांस और मदिरा जरूर प्रयोग करता होगा ? जबकि शाकाहार और मासाहार को अपनाना सबका निजी मामला होता है लेकिन इसमें हम साक्ष्य दे सकते है हमारे पूर्वजो का की वो भी इन सबका प्रयोग नहीं करते थे !!!  

ऐसी धारणाओ को हम ही बदल सकते हैं, केसे ?? समय रहते ही इन बुराइयों और अपने समाज में व्याप्त अन्य कु रीतियों से मुह मोड़कर !! 
हमारे कई साथी कुतर्क देते हैं कि हमारे पूर्वज राजा-महाराजा भी मांस मदिरा का प्रयोग करते थे तो हमें भी करना चाहिए बिना यह जानने कि चेष्टा किये बगैर की उस समय इन वस्तुओ का प्रयोग अगर किया भी जाता था तो क्यूं किया जाता था...???

हमारे पूर्वज अनवरत युद्धों में रत रहते थे उन्हें शारीरिक निरोगता
की ज्यादा जरूरत थी और केवल उस समय दारु (मदिरा) का प्रयोग आज की डीटोल की तरह अपने घाव पर लगाने के लिए दवा के रूप में किया जाता था ! आज की तरह पिने और पिलाने में इसका उपयोग नहीं होता था !!! इस ग़लतफ़हमी में आकर ही अधिकाँश क्षत्रिय समाज अपनी जमीन जायदाद तक को बेच बेच कर जमींदार से जमींदोज हो चूके है !! आज हमें किसी क्षत्रु राज्य पर चढ़ाई नहीं करनी इसलिए हमें शारीरिक बल से ज्यादा मानसिक बल व  निरोगता की ज्यादा जरूरत है जिसकी सहायता से हम समाज में उचित सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकते हैं !!

जो पथभ्रष्ट साथी शराब को राजपूती शान शौकत समझते हैं उन्हें लगता है कि मदिरा और मांस का प्रयोग करके ही शक्तिशाली बना जा सकता है तथा वो बड़े गर्व से सामाजिक मंचों पर भी अपने मदिरापान करते हुए चित्र पोस्ट करते हैं ,वे महाराणा स्वरूप सिँह जी मेवाड के उस चेतावनी राजाज्ञा पत्र को भी अवस्य पढ़ें जिसमे महाराणा ने शराब को गौहत्या के बराबर पाप घोषित किया है ।





इतिहास के झरोखे से। सही (हस्ताक्षरित)

 स्वास्ति श्री महाराजाधिराज महाराणा श्री स्वरूप सिंह जी के आदेशानुसार, श्रीजी (एकलिंग जी) की आज्ञा से पूरे शिशोधा मतलब समस्त शिशोदिया को दारू पीने की मनाही थी और महाराणा श्री अमर सिंह जी (छोटे मतलब द्वित्तीय) ने जब पीना शुरू किया था तब सभी पीने लगे । इसलिए इस पीने से कुफायदा अर्थात नुकसान ही हुआ है और धर्मशास्त्र की मर्यादा में भी दारू पीने को महापाप ही माना गया है ! इसीलिए अब संवत् 1902 , कार्तिक सुदी 9 को कैलाशपुरी पधार कर शराब एवं मद को छोड़ने का संकल्प श्री परमेश्वर के चरणविन्दों में किया है । इसलिए अब समस्त शिशोदिया कुल में इसी क्षण से यदि कोई शराब पियेगा तो , उन लोगों को श्रीजी (एकलिंग जी) की सौगंध है और उन्हें चित्तोड़ हत्या अर्थात देशद्रोह ,और कोटि कोटि गौ मारने की हत्या का अपराध समझा जायेगा । हमारे वंश में फिर दारू पीने का विचार या दूसरे पीने वाले शिशोदिया को यदि सजा नही दी गयी तो ऊपर वर्णित (चित्तोड हत्या और कोटि कोटि गौ हत्या ) की सौगंध है । सभी को श्रीजी का अन्न जल (अर्थात एकलिंग जी के भोग लगे भोजन) को पाने का आदेश दिया जाता है ।

अब तक बचपन से शक्तावत क्षत्रियों को महासती द्वारा शराब की मनाही की बात सुनी थी !! अब यह पुराना राज्यादेश ही नहीं श्रीजी की इच्छा का प्रमाण भी ले मिल गया है और यह भी सही है कि जिस भी सिसोदिया या अन्य किसी भी क्षत्रिय ने शराब का सेवन किया उसका भारी नुकसान के साथ वह जड़ मूल से ख़त्म ही हुआ है !!!

जय श्री एकलिंग नाथ
जय श्री चारभुजा नाथ
 

Thursday, 2 April 2015

वीर वर राठौड राजा रुघनाथ सिंह जी मारोठ

मेड़तिया रुघनाथरे, मुख पर बंकि मूँछ।
भागे हाथी शाहरा, करके ऊंची पूँछ ।।

आज वीर वर राठौड राजा रुघनाथ सिंह जी मारोठ की जयंती है। समारोह भी हमेशा की तरह पैतृक जन्म स्थान मारोठ (नावाँ) में मनाया जा रहा है ।

वंशावली व वंशज
-    राव जोधा जी-    राव दुदा जी -    राव विरमदेव जी-    राव जयमल जी-    गोयंददास जी-    सांवलदास जी-    रुघनाथ सिंह जी मारोठ-    किशोर सिंह देवली बड़ी -    जालिम सिंह जूसरी जिन्होंने कुचामन गढ़ की नीव रखी -    सुरतान सिंह कुचामन-    मालम सिंह कुचामन-    शिवदान सिंह धनकोली गढ़  
-    हुक्म सिंह धनकोली-    रामलाल सिंह जूसरी-    धने सिंह जूसरी-    लक्षमण सिंह जूसरी व इनके -    मोहन सिंह, जगदीश सिंह, केशव सिंह, मूल सिंह -    मोहन सिंह जूसरी के भंवर सिंह व नोरतन सिंह 
-    जगदीश सिंह जूसरी के विरेंद्र सिंह व विजेंद्र  सिंह 
-    केशव सिंह जूसरी के ईशु सिंह 
-    मूल सिंह जूसरी के शक्ति सिंह
-    भंवर सिंह राठौड जूसरी  के हर्दयांश सिंह


Wednesday, 1 April 2015

जातीय वैमनस्यता की जड़े

समाज की बहुत सारी जातियों में यह धारणा है की सिर्फ राजपूतों ने ही उनका शोषण किया है सभी का, पर ऐसा बिलकुल नहीं है !!! सभी ने खुद से नीची जाती का शोषण किया है , उदहारण के लिए जाट खुद चमार या भंगियों से छुआछूत करते थे आज भी करते हैं, यहाँ तक की चमार भी भंगी के घर से परहेज करता है और अपने आप को बड़ा मानता है !! लेकिन राजपूत कभी भी ऐसा नहीं करते थे फिर भी जब भी शोषण की बात चलती है और आकर रूकती है तो राजपूत पर ही है !  रही सही कसर राजपूत युवा खुद ही पूरी कर रहे हैं। फेसबुक व WHATSAPP पर शराब, शायरी, झटका और बन्दूको की फूहड़ता भरी तस्वीर डालकर खुद ही अपना दुस्प्रचार कर अन्य जातियों की दलील को मजबूत कर रहे है l वास्तव में क्या व्यवस्था थी उसका उदहारण निचे है l  राजपूतों को चाहिए की इंटरनेट पर हमेशा अपना पॉजिटिव सकारात्मक प्रचार करें, हमारे पूर्वज ज्ञानी और बहादुर थे न की छिछोरे, शराबी या कूल ड्यूड थे, वे फटे पुराने पहन लेते थे लेकिन अपनी जनता या प्रजा को व उनके दुखो को सर आँखों पर रखते थे l ये ज्यादा खराबा तो पिछले 300 वर्षो में अंग्रेजो के आने और उनका अनुसरण करने से हुवा है !!!

हाल में शुरू हुए बेटी बचाओ कार्यक्रम के उद्घाटन के समय अख़बार में एक खबर प्रकाशित हुयी थी, जिसमे कन्या शिशु वध रोकने के लिए राज बीकानेर से महाराजा सर गंगा सिंह जी (राजस्थान के भागीरथ) के समय जारी शाही फरमान का जिक्र था, जिसकी पहली पंक्ति थी "सभी राव-उमराव-ठाकुरों (राज बीकानेर के राजपूत प्रतिनिधि), नगर सेठ-साहूकारों-महाजनों (राज बीकानेर के वैश्य प्रतिनिधि), चौधरीयों (राज बीकानेर के जाट/बिश्नोई प्रतिनिधि) को आदेश दिया जाता है की …… हुकम की तामील करवाएं" . इस से जाहिर होता ही की उस समय भी सभी को क्षेत्र और संख्या के हिसाब से राज कार्य में प्रतिनिधित्व प्राप्त था।

पर आज के गैर राजपूत युवाओं के लिए इतिहास के ज्ञान का श्रोत या तो फिल्मे हैं या फिर उनके सामाजिक ठेकेदारों के द्वारा बताई मनगढंत कहानियां, जातिवादी वैमनस्यता का असल कारण काफी हद्द तक यह है ! क्यों की अपना स्वय का धर्म, इतिहास और संस्कृति को देखते पढ़ते नहीं और दिखने वाली को ही यथार्थ ज्ञान समझ बैठते हैं !!!  मेरा निजी अनुभव है, मैंने अपने गैर राजपूत मित्रों से जब भी पुछा की आपने कभी निजी तौर पर या अपने बुजुर्गों के निजी अनुभव से तथाकथित राजपूत अत्याचार झेला है क्या ??? तो जवाब यही मिला की नहीं, हमारे या हमारे बुजुर्गों के साथ तो कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ पर हमने "सुना" है और सुना किससे है तो कोई जवाब नहीं और जवाब है तो पाखंडीयो का व विद्वेसता फेलाने वाली पार्टियों का !!! जाट राजपूत को ही नहीं समाज में रहने वाले हर ‪#‎धार्मिक‬ वर्ग को भी इस सबकी महती आवस्यकता है की वह इन सब पर विचार करे जिससे आपसी वैमनस्यता कम हो सके। क्यों की इन राजनितिक पार्टियो ने भी हमारे समाज में वर्ग संघर्ष के साथ साथ धार्मिक संघर्ष की जड़ो को भी खूब सींच समझ कर द्वेस्ता का एक विशाल वट खड़ा कर दिया है जो हम सबके शास्वत विचार करने और समझता पूर्ण कार्यो के करने से ही वापस गिरना संभव हो सकेगा !!! 
भंवर सिंह राठौड जूसरी

Sunday, 29 March 2015

Sunday रविवार सूर्यदिवस पर कुछ विशेष करे l


आईये हमारे हर सूर्यदिवस Sunday को कुछ रचनात्मक करते है !!! 

भारत में Sunday यानि रविवार की छुट्टी का कारण !!
 
हमारे ज्यादातर लोग Sunday की छुट्टी का दिन enjoy करने में लगाते है।

 
उन्हें लगता है, की हम इस Sunday की छुट्टी के हक़दार है।

 
क्या हमें ये बात का पता है, की Sunday के दिन हमें छुट्टी क्यों और कैसे मिली ???
और ये छुट्टी किस व्यक्ति ने हमें दिलाई ???

और इसके पीछे उस महान व्यक्ति का क्या मकसद  था ??? 
क्या है इसका इतिहास ???

साथियों, जिस व्यक्ति की वजह से हमें ये छुट्टी हासिल हुयी है, उस महापुरुष का नाम है "नारायण मेघाजी लोखंडे". (Narayan Meghaji Lokhande)

नारायण मेघाजी लोखंडे ये ज्योति राव फुलेजी के सत्यशोधक आन्दोलन के कार्यकर्ता थे और एक कामगार नेता भी थे।
अंग्रेजो के समय में हफ्ते के सातो दिन मजदूरो को काम करना पड़ता था । लेकिन नारायण मेघाजी लोखंडे जी का ये मानना था की, हफ्ते में सात दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते है ।
लेकिन जिस समाज की बदौलत हमें नौकरिया मिली है, उस समाज की समस्या छुड़ाने के लिए हमें एक दिन छुट्टी मिलनी चाहिए।
उसके लिए उन्होंने अंग्रेजो के सामने 1881 में प्रस्ताव रखा ।

 
लेकिन अंग्रेज ये प्रस्ताव मानने के लिए तेयार नहीं थे। 

 
इसलिए आख़िरकार नारायण मेघाजी लोखंडे जी को इस Sunday की छुट्टी के लिए 1881 में आन्दोलन करना पड़ा । ये आन्दोलन दिन-ब-दिन बढ़ते गया । लगभग 8 साल ये आन्दोलन चला ।
आखिरकार 1889 में अंग्रेजो को Sunday की छुट्टी का ऐलान करना पड़ा ।

 
ये है इतिहास ।
क्या हम इसके बारे में जानते है ??? 


अनपढ़ लोग छोड़ो लेकिन क्या पढ़े लिखे लोग भी इस बात को जानते है ??? जहा तक हमारी जानकारी है, पढ़े लिखे लोग भी इस बात को नहीं जानते। 

अगर जानकारी होती तो Sunday के दिन enjoy नहीं करते....समाज का काम करते....और अगर समाज का काम ईमानदारी से करते तो समाज में भुखमरी, बेकारी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी, धर्म ह्वास, अपनी संस्कृति का हरण ये समस्यायें आज बिल्कुल नहीं होती !!
 
साथियों, इस Sunday की छुट्टीपर हमारा हक़ नहीं है, इस पर सबसे बड़े वार यानी "परि वार ","समाज" का हक़ है।

 
कोई बात नहीं, आज तक हमें ये मालूम नहीं था लेकिन अगर आज हमें मालूम हुआ है तो अब से ही, पहले से कर रहे है तो बहुत अच्छा है हर Sunday का ये दिन हम "mastic day" नहीं "mission day" मनायेंगे ओर विचार क्रांति फैलाएंगे ।।
निवेदक - भंवर सिंह राठौड जूसरी



 

Thursday, 5 March 2015

घर पर ही बना लेवे ईनो

घर पर ही बना लेवे ईनो ....!
लूट की भी एक हद होती है लेकिन इसमें हमारी भी कमी है हम सब की आदत हो गई है कि हम कुछ करना ही नहीं चाहते है बस बना-बनाया मिले शारीरिक कस्ट न हो जरा सी भी बुद्धि न लगानी पड़े सब कुछ स्मार्ट तरीके से हो जाए बस  !!!
 जो लोग घर में ईनो बनाने के इच्छुक है उनके लिए -
 भारत में जो ईनो की 100 ग्राम की शीशी लगभग 80-85 रुपए की मिलती है उसमें केवल 8 रुपए मूल्य की सामग्री होती है। 100 ग्राम ईनो में लगभग 45 ग्राम साइट्रिक एसिड होता है इसका मूल्य है पांच रुपए और 55 ग्राम मीठा सोडा होता है जिसका मूल्य है लगभग तीन रुपये होता है।
साइट्रिक एसिड - 100 रूपए/किलो मीठा सोडा- 60 रूपए/किलो l
घर पर ENO बनाने के लिए:-
1 निम्बू + थोडा मीठा सोडा + चुटकी नमक एक निम्बू का रस निकाले उसमें चुटकी नमक और
थोडा सा मीठा सोडा डाले और एक गिलास पानी डाल के पिए....एक दम ENO जैसा बन जाएगा l